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भारत 360°

मन्नू भंडारी :: :: :: यही सच है :: कहानी

कानपुर सामने आँगन में फैली धूप सिमटकर दीवारों पर चढ़ गई और कंधे पर बस्ता लटकाए नन्हे-नन्हे बच्चों के झुंड-के-झुंड दिखाई दिए, तो एकाएक ही मुझे समय का आभास हुआ। घंटा भर हो गया यहाँ खड़े-खड़े और संजय का अभी तक पता नहीं! झुँझलाती-सी मैं कमरे में आती हूँ। कोने में रखी मेज पर किताबें बिखरी पड़ी हैं, कुछ खुली, कुछ बंद। एक क्षण मैं उन्हें देखती रहती हूँ, फिर निरुद्देश्य-सी कपड़ों की अलमारी खोलकर सरसरी-सी नजर से कपड़े देखती हूँ। सब बिखरे पड़े हैं। इतनी देर यों ही व्यर्थ खड़ी रही; इन्हें ही ठीक कर लेती। पर मन नहीं करता और फिर बंद कर देती हूँ। नहीं आना था तो व्यर्थ ही मुझे समय क्यों दिया? फिर यह कोई आज ही की बात है! हमेशा संजय अपने बताए हुए समय से घंटे-दो घंटे देरी करके आता है, और मैं हूँ कि उसी क्षण से प्रतीक्षा करने लगती हूँ। उसके बाद लाख कोशिश करके भी तो किसी काम में अपना मन नहीं लगा पाती। वह क्यों नहीं समझता कि मेरा समय बहुत अमूल्य है; थीसिस पूरी करने के लिए अब मुझे अपना सारा समय पढ़ाई में ही लगाना चाहिए। पर यह बात उसे कैसे समझाऊँ! 2. मेज पर बैठकर मैं फिर पढ़ने का उपक्रम करने लगती हूँ, पर मन ...
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‘बोलना ही है’

रवीश कुमार की यह किताब ‘बोलना ही है’ इस बात की पड़ताल करती है कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किस-किस रूप में बाधित हुई है, परस्पर सम्वाद और सार्थक बहस की गुंजाइश कैसे कम हुई है और इससे देश में नफ़रत और असहिष्णुता को कैसे बढ़ावा मिला है। कैसे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि, मीडिया और अन्य संस्थान एक मजबूत लोकतंत्र के रूप में हमें विफल कर रहे हैं। इन स्थितियों से उबरने की राह खोजती यह किताब हमारे वर्तमान समय का वह दस्तावेज है जो स्वस्थ लोकतंत्र के हर हिमायती के लिए संग्रहणीय है.¶ ¶ हिंदी में आने से पहले ही यह किताब अंग्रेजी, मराठी और कन्नड़ में प्रकाशित हो चुकी है राजकमल प्रकाशन समुह की अनुमति से यह पुस्तक का अंश प्रकाशित किया गया है. जब भी कोई मुझे कहता है कि आपको बोलने से डर नहीं लगता, मेरे भीतर डर पसर जाता है। मैं अपने बचपन के उस रवीश के पास चला जाता हूं जो शाम के वक्त बेल के पेड़ के नीचे से गुज़रते वक्त हनुमान चालीसा रटने लगता था। जय बजरंग बली बोलने लगता था। किसी से सुना था कि बेल के पेड़ पर भूत होते हैं। पीछे से पकड़ लेते हैं। रास्ते में जब कोई नहीं होता था तो मैं चप्पल हा...

झीलों के इस शहर पर जहरीली गैस का एक झरना उस रात फूट पड़ने की तैयारी में था।

यूनियन कार्बाइड का कारखाना भोपाल शहर के एक छोर पर राक्षस की तरह खड़ा दूर तक फैली बस्ती की ओर देख रहा है. रविवार की उस ठंडी रात कुछ कोहरा था. सरकारी लट्टुओं से जो आभा फैल रही थी, वह अंधेरे को दूर नहीं कर पा रही थी. लोग ठंड में दुबके सो रहे थे. कारखाने के ठीक सामने सड़क के उस पार कोई हजार गरीब परिवारों की बस्ती, जयप्रकाश नगर के लोग उस ठंड में कैसे सो पा रहे होंगे, समझना मुश्किल है. लकड़ी की कमजोर पटियों, जिन्हें भोपाल की बोली में ‘फर्रे’ कहा जाता है, से बने वे झोंपड़े. वहीं से एक रास्ता, जो बस स्टैंड हमीदिया रोड तक जाता है. रोड के एक छोर पर है रेलवे स्टेशन का इलाका और दूसरे पर ताजमहल कहलाने वाली इमारतें, ताजुल मसजिद और शाहजहांबाद. अगर उस रात कुछ हलचल होगी तो इस सड़क पर. रेलवे स्टेशन पर लखनऊ से आनेवाली किसी ट्रेन का इंतजार था. कुली यहां-वहां बिखरे बैठे थे. ऊंघते सुस्त यात्री. यहां-वहां आग ताप शरीर की कंपकंपी दूर करने का प्रयत्न करते समूह. वह भोपाल के जीवन की सामान्य-सी रात थी. किसी को ख्याल नहीं था कि बहुत करीब बेरसिया रोड पर काली परेड के नाम से जाने जाते उस क्षेत्र पर बना कारखा...

विश्व बैंक की चोंकाने वाली रिपोर्ट , होशंगाबाद के स्पष्ट परिपेछ पर ।

32 सालों में क्या दिखेगा परिवर्तन? जलवायु परिवर्तन से भारत के जीवन स्तर में तेजी से गिरावट दर्ज हो रही है। इसी सन्दर्भ में विश्व बैंक की एक रिपोर्ट यह बताती है कि समूचे दक्षिण एशिया और भारत के मध्य,उत्तर, और उत्तर पश्चिम राज्यो पर जीवन स्तर और सामाजिक, आर्थिक, रूप से क्षति पहुच सकती है। इसकी चपेट में आने वाले दस सबसे प्रभावित जिलो में महाराष्ट्र के 7, छत्तीसगढ़ के 2, मध्यप्रदेश का होशंगाबाद होगा । यह सभी जिले अगले 32 सालो में देश के सबसे गर्म स्थान होंगे। विश्व बैंक ने भारत सहित दक्षिण एशिया के देशों को इसे लेकर उस समय सतर्क किया है, जब अकेले भारत के तापमान में सालाना डेढ़ से दो डिग्री तक की बढ़ोतरी हो रही है। आर्थिक हानि की दृष्टि से । विश्व बैंक के मुताबिक वर्ष 2050 तक यह गिरावट अधिकतम 10 फीसद तक हो सकती है। इसकी चपेट में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़ , राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले राज्य होंगे। इसके चलते कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ का कहर होगा, जिससे जनजीवन के प्रभावित होने की आशंका है। इस बदलाव का असर भारत की जीडीपी पर पड़ेगा , जिसमें औसतन ...

सावरकर और महात्मा गांधी

सावरकर और महात्मा गांधी विनायक सावरकर जिन पर भी गीता और महाभारत की उनकी ‘युद्धवादी’ समझ ही हावी रही. 1909 में ही जब मदनलाल ढींगरा ने लंदन में कर्नज वॉयली की सरेआम गोली मारकर हत्या की थी, तो इसके पीछे दोनों छोटे सावरकर-बंधुओं की प्रेरणा तय मानी जा रही थी. सावरकर ने इस हत्या के बाद भी ढींगरा के समर्थन में व्यापक राजनीतिक गोलबंदी भी की थी. जबकि गांधी ने उस समय कड़े शब्दों में लिखा था कि दंड ढींगरा को नहीं बल्कि उसे सिखानेवाले को दिया जाना चाहिए. गांधी के शब्द थे – ‘(हत्यारे) की सफाई निकम्मी है. यह काम हमारे विचार से कायरता का है. फिर भी उसके ऊपर तो दया ही आती है. उसने निकम्मा साहित्य ऊपर-ऊपर से पढ़कर यह काम किया है. उसने अपने बचाव का बयान भी रट रखा था, ऐसा जान पड़ता है. दंड तो उसको सिखाने वाले को देना चाहिए. मैं उसको निर्दोष मानता हूं. हत्या नशे में किया गया कार्य है. नशा केवल शराब या भांग का ही नहीं होता, किसी पागलपन भरे विचार का भी हो सकता है.’ सावरकर और महात्मा गांधी अब यह स्पष्ट नहीं है कि गांधी ने ढींगरा को सिखानेवाले के रूप में सावरकर-बंधुओं की पहचान की थी या नहीं. क्...